टीटसिन की सन्धि के द्वारा चीन में होने वाले परिणामों का विवेचन कीजिये ?

टीटसिन की सन्धि के द्वारा चीन में होने वाले परिणामों का विवेचन कीजिये ?

1842-46 ई० के बीच चीन में लगभग सौ ९ हुए थे। इसी प्रकार टीटसिन की सन्धि के द्वारा चीन का द्वार पश्चिमी देशों विद्रोह हुए थे। इस के लिए पूर्णतः खुल भी प्राप्त हुआ, जनता का असंतोष प्रभाव का विरोध का प्रणतः खुल चुका था । साथ ही इन विदेशियों को विशेष राज्य क्षेत्राधिकार हुआ, जिससे वे आन्तरिक राजनीति में भी हस्तक्षेप करने लगे । अतः असतोष और बढ़ गया और चीन में विदेशियों के निरन्तर बढ़ते हुए पराध करने के लिए कई क्रान्तिकारी संस्थाए बना । इन सस्थाआम ख्या धीरे-धीरे बढ़ने लगी। कुछ समय बाद यह असताष वद्राहक
हुआ, जो चीन के इतिहास में ‘ताइपिंग विद्रोह के नाम प्रसिद्ध पाप ताइपिंग के विद्रोह में कई प्रकार के असन्तुष्ट वर्ग भा सम्मलित थे ए क विद्रोह था। बढ़ते हुए आर्थिक असंतोष से किसान
किसानो की संख्या धीरे-धार रूप में प्रकट हुआ, कायद्यपि ताइपिंग के वि किन्तु मूलतः यह सम्मिलित थे, जो धारि मोनू वंश से नाराज थे । इनके साथ वे लोग भी सम्मिलित थे। स्वतंत्रता प्राप्त करना चाहते थे । चीन में पूर्वज-पूजा के पश्चात् राजा ही, होता था । सभी के लिए उसके द्वारा निर्धारित धार्मिक रीति-रिवाजों करना आवश्यक होता था। ईसाई धर्म के प्रचार से भी वहाँ नई चेतना राजा ही धर्मा रिवाजों का पात्र नई चेतना का

ताइपिंग विद्रोह-

ताइपिंग विद्रोह का प्रधान नेता हुग-गुच्वान था। क्वांगतुंग का निवासी था । उसने अपने साथियों के सहयोग से एक गुप्त समिति स्थापना की, जिसका नाम ‘शान्गति अथवा ईश्वर-आराधना का संगठन कि शान्गति की आराधना एक ऐसा कार्य था, जो मान्यता के अनुसार सबाट ही कर सकता था । अतः इस आराधना पर रोक लगा दी गईाहंगको नये धर्म की प्रेरणा स्वप्न में आई थी । अतः उसने घोषणा कर दी कि ईश्वरीय सम्राट’ है और वह एक नये शासन “ताइपिंग (पूर्ण शान्ति । स्थापना करेगा। 11 जनवरी, 1851 के दिन हुंग तथा उसके साथियों । ‘ताइपिंग-तिएन-कुओं (चिर शान्ति की देवी का राज्य) की घोषणा कर दी। एक विद्रोही या क्रान्तिकारी सरकार थी, जो मांचू शासन को स्वीकृत नहीं दी। धीरे-धीरे यह विद्रोह नानकिंग तक बढ़ गया और अन्ततः उसे जीत लिया ता उसको राजधानी बनाकर अपना शासन आरम्भ किया । इसी बीच दूसरा असे युद्ध आरम्भ हुआ | विदेशी लोग यह कभी सहन नहीं कर सकते थे कि नानकि एक ऐसी सरकार स्थापित रहे, जो देश की दशा को सुधारने में तत्पर हो और विदेशियों के साम्राज्यवाद की विरोधी हो । अतः 1864 ई० में मां सरकार अनुमति पर इस विद्रोह को पूर्णतः समाप्त कर दिया । यद्यपि ताइपिग विद सफल नहीं हो सका पर इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि प्रायः ।

वर्षों तक चीन के देशभक्तो ने अपने देश में एक ऐसी सरकार के. के.यम करत प्रयास किया, जो किसानों की दशा सुधारने के लिए प्रयत्नशील यी, सप विदेशियों के बढ़ते हुए प्रभाव को रोकने के लिए तत्पर थी । इस प्रकार किस अपरी स्थिति को सुधारने तथा विदेशियों के चंगुल से निकलने के लिए यह किया था किन्तु उन्हें इसमें सफलता प्राप्त नहीं हुई । किन्तु इस विवाह भावना प्रबल हो गयी कि विदेशियों के कारण ही उनके प्रयास विफल हुए है। सर्वप्रथम इन विदेशियों के विरुद्ध ही संघर्ष करना होगा।

चीन में राजनीतिक चेतना का विकास-

सन् 1894-95 में जापान बीच युद्ध हुआ । इस युद्ध में जापान ने कोरिया पर अधिकार कर लिया में फारगोसा, पीकाडोर तथा लिआओतुंग प्रायद्वीप भी उसने ह पान कलागी ने अपनी दुर्दशा को अच्छी तरह से अनुभव कर लिया।

यह कहा जाने लगा कि “एशिया का बीमार मानव अन्तिम साँस ले रहा है। साम्राज्यवादी गिद्ध उसके क्षत-विक्षत शरार जापान व चीन उसने हड़प लिये । इस मानव विक्षत शरीर पर अब भण्डरा रहे थे । अमेरिकी अर्थात् सभी देशों के लि अनुचित शतों के थे। अमेरिकी दबाव से अन्य आक्रान्ताओं ने मुक्त द्वार नीति अपनायी, देशों के लिए चीन के आर्थिक शोषण का द्वार खुला | विदेशी ऋण यतों के साथ चीन पर लाद दिए गये। इन परिस्थितियों में यह स्वाभाविक चीन में ऐसे दलों का प्रादुर्भाव हो, जिनका उद्देश्य देश की राजनीतिक लता को दूर कर शक्ति का संचार करना हो । अनेक चीनी युवक विदेशों में कर उच्च शिक्षा प्राप्त करके पुनः चीन लौटे थे, उनका यह प्रयत्न था कि वे देश की दशा म सुधार कर। इस कार्य मे डॉ सनयात सेन के दल ने विशेष सनी | डॉ सनयात सेन हवाई द्वीप तथा हांगकांग के विद्यालयों में अध्ययन कर दे पाश्चात्य विचारों के सम्पर्क में आकर उनका यह विचार बना कि चीन भी फ्रांस-ब्रिटेन आदि के समान समृद्ध देश होना चाहिये । जापान का उदाहरण उनके सम्मुख था।

1895 ई० में उन्होंने केन्टन में एक विद्रोह का नेतृत्व किया कित उनका यह प्रयत्न असफल रहा । उन्हें चीन छोड़कर जाना पड़ा । सुधार करने के पक्ष में एक अन्य देशभक्त कांग-यू-वेई था किन्तु वह क्रान्तिकारी विचारों को महत्त्व नहीं देता था । उसका विचार था कि सुधारों के आधार पर वैध राजसत्ता की स्थापना की जा सकती है । उसे सम्राट की सार्वभौम सत्ता में पूर्ण विश्वास था। सम्राट कुआंगहुसू की सहानुभूति इन सुधारवादियों के साथ थी । कांग-यू-वेई ने एक सुधार कार्यक्रम सम्राट के पास भेजा, जिसे सम्राट ने स्वीकार कर लिया और जून 1898 से सितम्बर, 1898 तक अनेक आज्ञाएं प्रकाशित की गई, जिनका उद्देश्य चीन के शासन में सुधार करना था । इन राजाज्ञाओं में केवल शासन सम्बन्धी सुधारों का ही आदेश नहीं दिया गया था, आपतु कई सुधार कार्य भी आरम्भ किये गये थे । शिक्षा का विस्तार किया गया और पुरानी शिक्षा व्यवस्था के स्थान पर व्यावहारिक शिक्षा पर जोर दिया गया। आधुनिक स्कूल और कालेज खोलने की योजनाएँ बनायी गई । राजनीति और सान सम्बन्धी पश्चिमी पुस्तकों के अनुवाद की व्यवस्था की गई। बहुत से व्यर्थ के सरकारी पदों को समाप्त कर सरकारी खर्च में कटौती की गई।

सेना के पुनर्गठन लिए कुछ नियमों का प्रावधान किया गया । परन्तु दुर्भाग्यवश सम्राट के द्वारा परम सुधारों का यह युग केवल 100 दिन चला । उत्तरी चीन के मांचू साधकारी इन सुधारों के पक्ष में नहीं थे, परिणामस्वरूप रूढ़िवादियों ने राजमाता का भड़काकर सम्राट को बन्दी बना लिया। इस प्रकार चीन में सुधारा का युग बिना किसी उपलब्धियों को प्राप्त किये समाप्त हो गया। सर बान्दोलन-डॉ सनयात सेन की विचारधारा 1885 ई० से ही स्पष्ट होने 1894ई० में चीन-जापान युद्ध में सनयात सन न होनालूलूम 33ई (चीन-पुनर्जागरण संस्था) की स्थापना का, जिसका उद्दश्य माचू का समाप्त करना था। चीन की जनता भी विदेशी शासकों के बढ़ते हुए शासन को समाप्त चीन में एक दल र दल कहा गया। प्रभाव को देखकर विद्रोह करना चाहती थी ।

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