प्रथम चीन जापान युद्ध के क्या कारण थे ?

प्रथम चीन जापान युद्ध के क्या कारण थे ?

अतः जब जापान ने कोरिया में वित्तीय, प्रशासकीय और सैनिक सुधारों के लिए संयुक्त चीन-जापानी कार्यवाही का प्रस्ताव रखा तो चीन नहीं चाहता था कि जापान कोरिया में कोई हस्तक्षेप कर आता कोरिया के प्रश्न पर चीन-जापान युद्ध 1 अगस्त, 1894 को आरम्भ हो गया।

शिमोनोस्की की सन्धि-

कोरिया के प्रश्न पर चीन-जापान युद्धनौ माह तक चला । जल और थल दोनों स्थानों पर जापान की विजय हुई। जापान की सेना सुसंगठित, सुशिक्षित, अनुशासित और आधुनिकतम हथियारों से लैस थी। इसके विपरीत चीनी सेना अव्यवस्थित थी। ऐसी स्थिति में चीन को बाध्य होकर सन्धि के लिए प्रार्थना करनी पड़ी । दोनों देशों के बीच शिमोनोस्की की सन्धि के द्वारा युद्ध का अन्त हुआ । इस सन्धि में अग्रलिखित बातें तय की गई।

(6) चीन ने कोरिया की स्वाधीनता को मान लिया।

(ii) चीन को फारमोसा द्वीप, पेसकाडोरस तथा लियाओतुंग प्रायद्वीप जापान को देना पड़ा । लियाओतुंग प्रायद्वीप में ही पोर्ट आर्थर पड़ता था। यह स्थान भी महत्त्वपूर्ण था।

(iii) चीन ने युद्ध की क्षतिपूर्ति के रूप में 45 करोड़ रुपया (30 करोड़ तायल) जापान को देना स्वीकार किया ।

(iv) चीन ने जापान के व्यापार के लिए सांसी, चुंगकिंग, शू चाउ, हंगचाऊ के शहर खोल दिए।

पीला आतंक (Yellow Paril)

चीन जापान युद्ध के सम्बंध में केटलबी ने लिखा है कि-जापान ने इस युद्ध से यूरोप वालों को दिखा दिया था कि वह मामूली शक्ति नहीं थी । यूरोपवासी समझ गये थे कि सुदूरपूर्व में एक नये सूर्य का जन्म हुआ है और पूर्व की विजयों के लिए एक नया प्रत्याशी पैदा हो गया है । एशिया में जापान के विस्तार को यूरोपवासी भय की दृष्टि से देखते थे और उसे पीला आतंक (Yellow Paril) कहते थे। विशेषतया, रूस इसका प्रबल विरोधी था । लियाओंतुंग प्रदेश पर रूस अपना प्रभाव स्थापित करना चाहता था । इसी प्रकार फ्रांस तथा जर्मनी भी जापान की इस सफलता को ईर्ष्या भरी दृष्टि से देख रहे थे । रूस, फ्रांस तथा जर्मन ने मिलकर जापान पर दबाव डाला कि वह लियाओंतुंग प्रदेश से अपना अधिकार छोड़ दे । जापान इन शक्तिशाली देशों के आदेश को टाल नहीं सकता था। विवश होकर जापान ने लियाओंतुंग प्रायद्वीप पर अपने अधिकार का परित्याग कर दिया। इसके बदले में उसे चीन द्वारा सात करोड़ रुपये हजनि के रूप में दिये गये। इन तीनों शक्तियों के हस्तक्षेप का जापान को बड़ा कटु अनुभव हुआ । तकीकोशी के अनुसार, “जापान निवासियों की आन्तरिक इच्छा यह थी कि उनका देश संसार के संभान्त राष्ट्रों के निकट तक पहुँचने के योग्य बन सके । वह न उनसे नीचा रहे और न ही उनसे ऊपर जाये।” परन्तु यूरोपीय देशों ने जापान की अपेक्षा चीन को अधिक महत्त्व दिया | अब जापान को यह पता चला कि पश्चिमी देश शान्तिप्रिय संस्कृति की अपेक्षा सैनिक शक्ति को अधिक सम्मान प्रदान करते है। अतः उसने अपनी सैनिक प्रवृत्ति को और बढ़ाया ।

बाक्सर विद्रोह के दमन में जापान का योग-

चीन द्वारा विभिन्न देशों को विभिन्न भूभागों के पट्टे देने तथा साम्राज्य को विभिन्न प्रभाव क्षेत्रों में विभाजित करने के पश्चात् चीन में एक सुधार आन्दोलन आरम्भ हुआ । युवा सम्राट के नेतृत्व में सुधारवादी लोगों ने पाश्चात्य प्रणाली के अनुकरण पर राष्ट्र के पुनर्गठन का प्रयत्न किया । इसकी प्रतिक्रिया 1900 ई० के सशस्त्र विद्रोह के रूप में सामने आई, जिसका संचालन राजमाता की अनुमति से राष्ट्र को पश्चिमी देशों के प्रभुत्व से बचाने के लिए अनुदार दल ने किया था । इस अनुदार दल को बाक्सर कहा जाता था । इन्होंने पेकिंग के दूतावासों में रहने वाले विदेशियों पर आक्रमण किया और सम्पूर्ण उत्तरी चीन के आरक्षित प्रदेशों में रहने वाले ईसाई धर्म प्रचारकों तथा उनके द्वारा धर्मातरित व्यक्तियों की हत्या की । फलस्वरूप सम्बद्ध देशों ने मिलकर एक अन्तर्राष्ट्रीय सेना का गठन किया । जापान के पेकिंग में उपद्रवग्रस्त विदेशियों को बचाने के कार्य में सहयोग दिया, जिससे चीन के मामले में उसे अन्तर्राष्ट्रीय परिषद में बोलने का विशेष अधिकार प्राप्त हो गया।

बांग्ल-जापान सन्धि:

जापान का अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर महत्त्व-चीन-जापान युद्ध के बाद जापान के राजनीतिज्ञों में दो प्रकार के विचार कार्य कर रहे थे। एक पक्ष रूस के साथ सन्धि करके अपने देश की स्थिति मजबूत करना चाहता था, तो दूसरे मत के लोग इंग्लैण्ड के साथ सन्धि करने के पक्ष में थे। रूस तथा ब्रिटेन दोनों ही एशिया में साम्राज्य प्रसार का कार्य कर रहे थे। रूस बाल्कन प्रायद्वीप में अपना प्रभाव बढ़ा रहा था और उसी के कारण क्रीमिया का युद्ध हुआ था। ब्रिटेन अपने भारतीय साम्राज्य तथा चीन के आर्थिक स्वार्थ के कारण रूस का प्रभाव एशिया में रोकना चाहता था । इस कारण जापान की तरह ब्रिटेन भी किसी एशियाई शक्ति के साथ समझौता करने के पक्ष में था ताकि एशिया में उसकी शक्ति सुरक्षित रहे । अतः 1902 में जापान और ब्रिटेन के बीच एक सन्धि हुई, जिसके अनुसार दोनों पक्षों ने चीन की अखण्डता और पूर्वी एशिया की स्थिति को यथावत बनाये रखने का आश्वासन दिया । जापान ने चीन में इंग्लैण्ड के हितों और इंग्लैण्ड ने कोरिया में जापान के हितों को स्वीकार कर लिया। यह भी निश्चित किया गया कि दोनों में से किसी एक पर आक्रमण होने पर दूसरा देश तटस्थ रहेगा । किन्तु यदि आक्रमण करने वाली शक्तियां एक से अधिक हों, तो दोनों देश एक दूसरे की मदद करेंगे । जापान के लिए इस सन्धि का अर्थ था कि अगर कभी उसका रूस से युद्ध हुवा और फ्रांस या जर्मनी ने या दोनों ने रूस का साथ दिया, तो इंग्लैण्ड किसी एक का स्वीकार पान में इंग्लस्थितिसके पान वाली शक्तियां कमण होने पर वसा यह भी निश्चित और इंग्लैण्ड पूर्व तक ही सीमित रही। जापान का साथ निभायेगा। प्रारम्भ में यह सन्धि 5 वर्ष के लिए की गई और सुदूर इस सन्धि के द्वारा जापान यूरोपीय देशों के समान स्तर का देश समझा जाने लगा। यह पहला अवसर था, जिसमें किसी पश्चिमी शक्ति ने एशियाई शक्ति के महत्त्व को स्वीकार कर उससे समानता के आधार पर सन्धि की थी। अब जापान रूस के प्रति आक्रामक नीति अपना कर उससे बदला ले सकता था। इस सन्धि से जापान को अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व प्राप्त हुआ।

रूस -जापान युद्ध (1905) –

रूस ने बाक्सर विद्रोह का लाभ उठाकर अपने नागरिकों तथा सम्पत्ति की रक्षा के लिए शीघ्र ही अपनी सेनाएँ मंचूरिया भेज दी ।

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