जापान में सैन्यवाद का उदय (Rise of Militarism in Japan)

जापान में सैन्यवाद का उदय (Rise of Militarism in Japan)

तोकूगावा वंश में 1630 ई० में इमीयासू प्रथम शोगुन नियुक्त हुआ । इसी समय से जापान की सरकार का स्वरूप सैनिक बन गया । धीरे धीरे जापान में एक ऐसी व्यवस्था का विकास हुआ, जो मध्यकालीन यूरोप के सामन्तवाद से मिलती जुलती थी और इसी के समान अपने स्वरूप एवं आर्दशों में सैन्य प्रधान थी। इस व्यवस्था का बाकुफू (Bakufu) नाम तथा इसके अध्यक्ष की शोगुन (Shogun) उपाधि दोनो ही मूलतः सैन्य है। में सैन्य प्रधान थी । जुलती थी और इसी का हुआ, जो शोगुनों के अधीन सैनिक सामन्त या ‘दाइम्यो का पद था। दाइयों के साथ छोटे सरदार थे, जिनमें विशेष रूप से ‘समुराई’ या सैनिक वर्ग सम्मिलित था । इनकी यह पदवी वंशानुगत होती थी। अधिकांश सैनिक किसी न किसी सामन्त या शोगुन के प्रति पूर्ण निष्ठा रखते थे। जापान में सैनिक वर्ग की नीति-संहिता को ‘दूशीदों (Bushido) कहा जाता था।

राष्ट्रीय सेना का गठन –

उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक शोगुन प्रथा इसी तरह चलता रहा। 1868 ३० म मेइजी ने शोगुन प्रथा का अन्त कर जापान का शासना सूत्र अपन हाथों में ले लिया था। इसके बाद सम्राट ने स्वयं प्रशासन को सचारु रूप स चलाया । अगल० वषा म एक नये युग का सत्रपात हा जिसने जापान का विश्व की एक बड़ी शक्ति बना दिया | सम्राट के द्वारा किये गये कार्य ही “मेइजी पुनःस्थापना के मूल तत्त्व थे। सामन्त पद्धति का अन्त करते ही जापान की सरकार ने नई सेना का संगठन किया । अब तक जापान की सेना का गठन समुराई लोगों द्वारा होता था और ये समुराई विभिन्न सामन्तों की सेवा में रहकर सैनिक कार्य किया करते थे । साधारण जनता को यह अवसर नहीं दिया जाता था कि वे सेना में भर्ती हो सकें । किन्तु मेइजी ने सामन्ती सेना के स्थान पर राष्ट्रीय सेना का गठन किया, जिसमें योग्यता के अनुसार पद प्राप्त होते थे।

1872 में जापान में अनिवार्य सैनिक सेवा को आरम्भ किया गया, जिसके अनुसार सभी वर्ग के लोगों के लिए सैनिक सेवा अनिवार्य थी । अनिवार्य सैनिक सेवा में अधिकतर सैनिक कृषक वर्ग के तथा छोटे अधिकारी छोटे-छोटे जमींदार घरानों के ये । किन्तु जल सेना का संगठन इतने प्रजातांत्रिक ढंग पर नहीं हुआ था | अधिकतर नौसैनिक अधिकारी संभ्रान्त परिवारों से तथा सैनिक विभिन्न प्रकार की परिस्थितियों में रहने वाले परिवारों से लए गये थे। थल सेना की तरह वे किसी समूह विशेष से संबंधित नहीं थे | इससे जापान के जीवन में एक क्रान्तिकारी परिवर्तन आया।

इस प्रकार उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक जापान में सैनिक मनोवृत्ति का विकास हो चुका था। मेइजी शासन काल में जापान की सैनिक शक्ति में अत्यधिक वृद्धि हुई क्योंकि इस समय तक जापान में व्यापारिक उत्पादन में वृद्धि हो चुकी थी। अतः अतिरिक्त माल को बेचने तथा बढ़ती हुई आबादी को बसाने के लिए सैनिक शक्ति का सहारा लिया गया | जापान ब्रिटिश नाविक शक्ति के समकक्ष अपनी शक्ति को बढ़ाना चाहता था।

सैनिक संगठन पर राजा का प्रभुत्व –

जापान ने अपनी सैनिक शक्ति बढ़ाने के उद्देश्य से 1889 में एक आदेश प्रसारित किया, जिसके अनुसार युद्ध एवं नौसेना का मन्त्री महत्त्वपूर्ण एवं गोपनीय सैन्य मामले में बिना प्रधान मन्त्री से सलाह किये सीधे राजा से विचार विमर्श कर सकता था । 1898 में आधुनिक सेना के मुख्य निर्माता राजकुमार यामागाता ने इस आशंका से कि कहीं संसदीय सरकार के संघर्ष से सशस्त्र सेना का नियंत्रण असैनिक अधिकारियों के हाथ में न चला जावे, एक और आदेश प्रसारित करवाया, जिसके अनुसार युद्ध एवं नौसेना के मन्त्रियों के पद पर केवल सैनिक सेवा में कार्य करने वाले जनरल, लेफ्टिनेन्ट जनरल, एडमिरल तथा वाइस एडमिरल ही नियुक्त हो सकते थे। 1912 में इस आदेश में आंशिक  संशोधन किया गया, जिसके अनुसार अब सेवा निवृत्त सैनिक अधिकारी भी इस पद पर नियुक्त हो सकते थे। इस प्रकार सैनिक सेवा पर सीधे ही राजा का आधिपत्य एवं नियंत्रण स्थापित हो गया था।

देश में बढ़ती हुई राष्ट्रवाद की लहर ने सेना को और महत्त्वपूर्ण बना दिया। राष्ट्र की आशाएँ अब सेना पर टिकी हुई थी। इसके अतिरिक्त विभिन्न देशभक्त संस्थाओं ने भी सशस्त्र सेना को सुदृढ़ किया।

इस प्रकार हम देखते है कि उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों में जापान की सैनिक शक्ति बहुत अधिक बढ़ गई थी और इसके आधार पर वह अपना साम्राज्य विस्तार कर सेना को व्यस्त रखना चाहता था, इसके साथ ही अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में जापान अपना प्रभुत्व भी स्थापित करना चाहता था।

नवीन सैनिक शक्ति का परीक्षण एवं चीन-जापान युद्ध –

जापान चीन का पड़ोसी राज्य था । इसलिए उसकी दृष्टि में चीन पर आधिपत्य स्थापित करने का उसका स्वतः सिद्ध अधिकार था । चीन का जो अधीनस्य प्रदेश जापान के सबसे नजदीक था, वह कोरिया का राज्य था । मेइजी युग के पुनः स्थापना के पश्चात् जापान कोरिया से वैसा ही व्यवहार करने लगा था, जैसा व्यवहार पैरी ने जापान के साथ किया था । जापान इस पर अपना अधिकार स्थापित करना चाहता था । कोरिया पर आक्रमण करने के कई कारण ये

-(1) जापान अपनी नवीन सैनिक शक्ति का परीक्षण करना चाहता था,

(2) उस समय कोरिया के शासक कमजोर, अयोग्य और निकम्में थे, साथ ही उनमें आपसी संघर्ष भी चल रहा था,

(3) इसके अतिरिक्त कोरिया का 99 प्रतिशत विदेशी व्यापार जापान के साथ होता था।

वह धीरे-धीरे नौसेना और स्थल सेना तैयार कर पोर्टआर्थर पर एक विशाल नौसैनिक अड़ा बनाना चाहता था। जब 1884 तथा 1894 में कोरिया में विद्रोह हुए, जिन्हें दबाने के लिए उसने चीन से सहायता मांगी थी। चीन ने एक सेना कोरिया भेज दी । जापान ने चीन पर सन्धि का उल्लंघन करने के आरोप में एक जापानी सेना कोरिया में भेजी | जापान कोरिया के प्रश्न पर चीन से संघर्ष चाहता था। वह इस संघर्ष के बल पर यूरोप के देशों को यह बतला देना चाहता था कि पूर्वी एशिया की राजनीति में उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती । 1894 में कोरिया केवल जापान और चीन की ही चिन्ता का विषय नहीं था । वह यूरोपीय देशों की प्रतिद्वन्द्विता और एशियाई विरोधों का केन्द्र बन गया था । इंग्लैण्ड की नीति का मुख्य उद्देश्य रूस को कोरिया में पैर जमाने तथा बर्फ रहित बन्दरगाह प्राप्त करने से रोकना था। कोरिया का 99 प्रतिशत विदेशी व्यापार जापान के साथ होता था । चीन, जापान की इस प्रगति को रोकना चाहता था ।

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