जापान ने जर्मनी के विरूद्ध युद्ध की घोषणा

जापान ने जर्मनी के विरूद्ध युद्ध की घोषणा

जुलाई, 1914 में महायुद्ध आरम्भ हुआ । जापान भी इसमें सम्मिलित होना चाहता था । अतः उसने 15 अगस्त, 1914 को जर्मनी को चेतावनी दी कि वह सिगटाओ और शान्तुंग प्रान्त के सभी जर्मन अधिकार डेढ़ माह में जापान को सौप दे क्योंकि जापान उन्हें चीन को लौटाना चाहता था । यदि एक सप्ताह में जर्मनी ने इसे स्वीकार नही किया, तो जापान युद्ध की घोषणा कर देगा । जर्मनी ने जापान की धमकी का विरोध किया । फलस्वरूप 23 अगस्त को जापान ने जर्मनी के विरूद्ध युद्ध की घोषणा करके वह मित्र राष्ट्रों से मिल गया । जापान ने तुरन्त सिगटाओं में अपनी सेना भेज दी । जापानी सेना चीनी क्षेत्र से होकर सिगटाओ पहुँची ।

चीन ने अपनी तटस्थता की घोषणा

यद्यपि चीन ने अपनी तटस्थता की घोषणा कर दी थी परन्तु सारी सैनिक कार्यवाही चीनी क्षेत्र में ही हो रही थी और चीन अपनी निर्बलता के कारण जापान का विरोध करने की स्थिति में नहीं था । जापान ने सिगटाओ के अतिरिक्त शान्तंग प्रदेश में भी जर्मन रेलों और खानों पर अधिकार कर लिया।

शान्तुंग में जर्मनी का प्रतिरोध समाप्त

इस प्रकार 1914 के अन्त में जब शान्तुंग में जर्मनी का प्रतिरोध बिल्कुल समाप्त हो चुका था और उसके साथ ही सैनिक क्षेत्र कायम रखने की आवश्यकता समाप्त हो चुकी थी 17 जनवरी, 1915 को राष्ट्रपति युआन शिकाई ने जापान को सूचना दी कि पट्टे के क्षेत्र को छोड़कर शेष शान्तुंग प्रान्त में फिर से चीनी तटस्थता कायम होगी । जापान ने तुरन्त इस बात का विरोध किया और इसी बहाने चीन के समक्ष कुख्यात 21 माँगें (Notorious twenty one Demands) रखी। इन माँगों का उद्देश्य यह था कि जब तक यूरोप के राष्ट्र युद्ध में लीन है, तब तक वह चीन में अपना स्थान सुदृढ कर ले । इन मागों को पाँच भागों में विभाजित किया गया है। पहला भाग, शान्तुंग प्रदेश में जर्मनों के अधिकारों की समाप्ति का; दूसरा, दक्षिण मंचूरिया तथा पूर्वी आन्तरिक मंगोलिया में जापान की स्थिति के विषय में था; तीसरे में यांग्त्सी घाटी के क्षेत्र में जापानी औद्योगिक पूँजी लगाने का कार्यक्रम था; चौया, चीन के तटवर्ती प्रदेश को किसी अन्य देश को न सौपने की व्यवस्था के सम्बन्ध में था: पाँचवा, विविध विषयों के सम्बन्ध में था, जिसे मांगन कहकर ‘अनुरोध कहा गया था। इन सभी मांगों का उद्देश्य चीन को यूरोपवासियों के लिए बन्द करना तथा एशिया वालों के लिए खोलना था । यही कारण है कि इसे “एशिया का मुनरो सिद्धान्त” (Asiatic Monroe Doctrine) भी कहा जाता है।

दक्षिण मंचूरिया तथा पूर्वी आन्तरिक मंगोलिया में जापान की स्थिति

21 माँगों में मुख्यतः अग्रलिखित बातें थी-(i) शान्तुंग के प्रदेश में जर्मनी को जो विशेषाधिकार प्राप्त थे, उन्हें जर्मनी से प्राप्त करने के लिए जापान जो कुछ भी प्रयास करे चीन उसमें बाधक न हो ।

(ii) शान्तुंग के प्रदेश में रेलवे लाइन बिछाने का जापान को अधिकार दिया जाय और उसके समुद्र तट के सब बन्दरगाहों में उसे व्यापार आदि के विशेष अधिकार दिये जाएं

(1) लियाओंतुंग प्रायद्वीप और पोर्टआर्थर के पट्टे के काल को 25 वर्ष से बढ़ाकर 99 वर्ष कर दिया जाय। इसी प्रकार मंचूरिया में रेलवे लाइनों पर जापान को जो अधिकार प्राप्त है, उनका समय भी बढ़ाकर 99 वर्ष कर दिया जाये ।

राष्ट्रपति युआन-शकाइ (Yuan-Shih-Kai)

दक्षिणी मंचूरिया के जिन प्रदेशों पर जापान का जो रेलवे आदि के निर्माण के सम्बन्ध में विशेषाधिकार प्राप्त थे, उनमें जापानी लोगों को यह अधिकार भी दिया जाय कि वे वहाँ भूमि खरीद सके, मकान बना सके और स्वतन्त्रता के साथ भ्रमण कर सके | जापान की सहमति के बिना चीन इन प्रदेशों में किसी अन्य देश के लोगों को राजनीतिक, सैनिक व आर्थिक मामलों में सलाहकार के रूप में नियुक्त न कर सके और न ही इन प्रदेशों में किसी अन्य राज्यों को कोई विशेषाधिकार दिये जा सकें (M) मध्य चीन में इस्पात का जो कारखाना उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में लगाया गया था, उस पर जापान और चीन का सम्मिलित रूप से आधिपत्य होगा ।

(चीन जापान की अनुमति के बिना अन्य किसी देश को अपने समुद्रतट पर स्थिति बन्दरगाहों के पट्टे या व्यापार के नये विशेषाधिकार न दे |

(vi) चीनी सरकार को आन्तरिक व्यवस्था के लिए तथा राजनैतिक, सैनिक व आर्थिक क्षेत्र में सलाहकारों की आवश्यकता होने पर केवल जापानी ही नियुक्त किये जाएं।

(vii) जापान के बौद्ध धर्म के प्रचारकों को यह अधिकार हो कि वे चीन में जहाँ चाहें धर्म प्रचार कर सके व अपने विहारों व मंदिरों की स्थापना कर सकें।

(vii) चीन को जो भी अस्त्र-मास्त्र विदेशों से खरीदने हों, उनका कम से कम 30 प्रतिशत भाग वह जापान से ही क्रय करे ।

अन्याक्रमण विरोधी अधिकार

यदि चीन शस्त्रों के निर्माण के लिए कोई कारखाना स्थापित करे तो उसका प्रबन्ध भी चीन और जापान दोनों के सम्मिलित नियन्त्रण में रहे। निस्सन्देह ये माँग साधारण माँगे नहीं थी और जापान ने चीन के राष्ट्रपति युआन-शकाइ (Yuan-Shih-Kai) पर इन मांगों को तुरन्त स्वीकार करने के लिए दी तरफ स दबाव डाला। प्रथमतः उसको आश्वासन दिया गया कि जापान उसका हर प्रकार का सहायता देगा ताकि वह अपनी स्थिति को मजबूत कर सक। द्वितीय, उसके ऊपर दबाव डाला गया कि यदि वह नहीं माना तो वह युद्ध कालिए तैयार हो जाय 17 मई को जापान ने चीन को अल्टीमेटम दे दिया । जिस पत्र पर अल्टीमेटम लिखा गया था उस पर वाटर मार्क में भारी युद्धपोतों, मशीनगनों आदि के छायाचित्र अंकित थे ।

जापान द्वारा चीन को अल्टीमेटम

युआन-शेकाई डर गया और उसने प्रथम चार समूहों की माँग को स्वीकार कर लिया । इस प्रकार जापान को शान्तुंग में जर्मनी के समस्त विशेषाधिकार सौप दिये गये और रेलवे का विशेषाधिकार अलग से मुनाफे में दे दिया गया । इस प्रकार दक्षिणी मंचूरिया पर जापान को पूर्ण नियन्त्रण मिल गया । यही नहीं, जापान को चीन में कोयले और लोहे की खानों से लाभ उठाने के अधिकार प्राप्त हो गये और चीन के समुद्री किनारे पर जापान को पूर्ण ‘अन्याक्रमण विरोधी अधिकार प्राप्त हो गया । वस्तुतः अन्याक्रमण विरोधी अधिकारों द्वारा जापान को आश्वासन (Non-alienation Rights) दे दिया गया कि चीन के समुद्रों और बन्दरगाहों पर अन्य कोई विदेशी बिना जापान की आज्ञा के व्यापार नहीं कर सकेगा । किन्तु जैसा कि एक चीनी विद्वान् ने लिखा है, यदि पाँचवें समूह की माँग भी स्वीकार कर ली गई होती तो चीन की प्रभुसत्ता का ही अन्त हो गया होता। अतः उक्त माँगे भविष्य के लिए छोड़ दी गई। प्रथम विश्व युद्ध से जापान को बहुत लाभ हुआ ।

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