पोलैण्ड पर आक्रमण : द्वितीय विश्व युद्ध का आरंभ

इस समझौते से वर्साय की सन्धि द्वारा स्थापित व्यवस्था की अन्त्येष्टि हो गई और सामूहिक सुरक्षा में विश्वास समाप्त हो गया।

पोलैण्ड पर आक्रमण : द्वितीय विश्व युद्ध का आरंभ

1934 ई. में जर्मनी और पोलैण्ड के बीच दस साल के लिए एक अनाक्रमण समझौता हुआ। किन्तु इस समझौते का उद्देश्य केवल यह था कि जब जर्मनी आस्ट्रिया के विरूद्ध कार्यवाही कर रहा हो उस समय पोलैपड शान्त रहे । अब हिटलर ने पोलैण्ड के बन्दरगाह मेंजिग पर पहुँचने के लिए उससे एक गलियारे की माँग की। इस माँग द्वारा 1934 ई०का समझौता भंग हो गया। पोलैण्ड ने उसकी इस मांग को स्वीकार नहीं किया। हिटलर ने पोलैण्ड पर आक्रमण करने की तयारा आरम्भ कर दी। इसी बीच हिटलर ने रूस से एक अनाक्रमण सन्धि की (13 अगस्त, 1959 इस समझौते के द्वारा यह तय किया गया कि यदि दोनों में से एक, किसी तीसरी शक्ति के आक्रमण का शिकार बने तो दूसरा देश तीसरी शक्ति को मदद नहीं देगा । यह सन्धि दस वर्ष के लिए की गई थी। इस सन्धि का मुख्य उद्देश्य यह था कि जब जर्मनी पोलैण्ड से संघर्ष कर रहा हो तो रूस उसकी मदद नहीं कर सके।

जब हिटलर रूस की तरफ से निश्चिन्त हो गया तो उसने 1 सितम्बर, 1939 को प्रातः पोलैण्ड पर आक्रमण कर दिया । यह द्वितीय विश्वयुद्ध का प्रारम्भ था । हिटलर ने घोषणा की थी कि जर्मनी को आत्म रक्षा के लिए युद्ध लड़ना पड़ रहा है। इंगलैण्ड और फ्रांस ने इस आक्रमण का विरोध किया किन्तु हिटलर ने कोई परवाह नहीं की। अतः इंग्लैण्ड 3 सितम्बर, 1939 को जर्मनी के विरुद्ध युद्ध में आ गया । इस तरह हिटलर की विस्तारवादी विदेश नीति के परिणामस्वरूप द्वितीय विश्वयुद्ध आरम्भ हुआ।

हिटलर की विस्तारवादी विदेश नीति

इस प्रकार हम देखते है कि प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् असन्तुष्ट तथा पराजित देशों में सर्वसत्तावादी शासन आरम्भ हुआ और इन सत्ताधारियों ने अपने विस्तार कार्यक्रम के द्वारा विश्व के देशों को एक बार पुनः संकट में डाल दिया ।

1. प्लैट और इमण्ड – विश्व का इतिहास, पृ. 647 2. वही, पृ० 648 3. बी० मुसोलिनी – आत्मकथा, पृ० 65 4. लैंगसम – द वर्ल्ड सिंस 1914,पृ. 337 5. “All within the State, nothing outside the State, nothing against the State.” – Mussolini.

6. लिप्सन-यूरोप इन द नाइन्टिन्य एण्ड ट्वन्टियथ सैन्चुरी, पृ० 419 7. इसी दिन विक्टोरिया-वेनेटो युद्ध हुआ था।

8. बैन्स, ली: यूरोप सिंस 1914, पृ० 220 से उद्धृत १. मुसोलिनी, बी: आत्मकथा, पृ० 185 10. Hardy, Gathorne – A Short History of International Affairs. 11. मुसोलिनी, बी- आत्मकथा, पृ० 215 12. चौहान, देवेन्द्र सिंह- समकालीन यूरोप, पृ० 212-213 13. प्लैट और ड्रमण्ड – विश्व का इतिहास, पृ० 649 14. इटली का राष्ट्रीय आन्दोलन ।

15. नीडर एण्ड क्लोग-मेकिंग फासिस्ट्स, पृ०16 से उकृत 16. एल्फ्रेडो रोको- ‘पोलिटिकल डक्ट्रिन ऑफ फासिज्म’, पृ. 23-39

17. विद्यालंकार, सत्यकेतु – यूरोप का आधुनिक इतिहास, पृ०193 18. बैन्स – हिस्ट्री ऑफ यूरोप सिन्स 1914, पृ० 222 19. तेरह राष्ट्रीय सिंडीकेट संघ में से 6 पूँजीपतियों के, 6 मजदूरों के तथा एक वकील, डॉक्टर आदि व्यावसायिक वर्ग का। 20. चौहान, देवेन्द्र सिंह- समकालीन यूरोप, पृ० 219

21. लैंगसम – यूरोप सिंस 1914, पृ० 346 22. मुसोलिनी – ‘आत्मकथा’, पृ० 243 23. बैन्स-यूरोप सिंस 1914,पृ० 230 24. लैंगसेम – द वल्र्ड सिंस 1914, पृ० 357 से उद्धृत

पेरिस की शान्ति-संधि

25. राजदूतों का सम्मेलन पेरिस की शान्ति-संधि के समय नियुक्त किया गया था- इसमें  इंग्लैण्ड, फ्रांस आदि मित्र राज्यों के प्रतिनिधि थे। 26. बैन्स -यूरोप सिंस 1914, पृ० 232 27. लैंगसम – द वर्ल्ड सिंस 1919, पृ० 208 28. वेग-यूरोप सिंस 1815, पृ० 618 29. लैंगसम – वही, पृ० 214 30. लैंगसम – वही, पृ० 231

31. एलेन बुलक-हिटलरः ए स्टडी इन टिरेनी, पृ० 19 32. मीन कैम्फ, पृ० 32 33. क्रेग-वही, पृ०626 34. लिप्सन-यूरोप इन व नाइनटिप एण्ड ट्वेन्टियथ सैचुरीज, पृ० 386. 35. लिप्पन – वही, पृ० 235 36. बैन्स – वही, पृ0255 37. लैंगसम- वही, पृ० 236 38. लैंगसम – वही, पृ. 220 39. S. A. (Sturm Abteilung). S.S.(Schuiz Stafilen)

40. पवित्र रोमन साम्राज्य को प्रथम राइख’ और उसके पश्चात् 1871 ई० से 1918 ई० तक द्वितीय राइख’ माना जाता था।

41. लैंगसम -वही, पृ० 236 42. एलेन बुलक– हिटलर : ए स्टडी इन टिरेनी, पृ. 249 43, वैन्स – यूरोप सिंस 1914, पृ. 263

44. हिटलर- “मीन किम्फ”, पृ. 23 45. लैंगसम-द वर्ल्ड सिंस 1919, पृ० 238 46. लौहान देवेन्द्र सिंह- समकालीन यूरोप, पृ. 294

47. Kगसम – यूरोप सिंस 1919 पृ० 243 48, मीन कैम्फ-पृ० 531 49, एलेन दुमका- वही, पृ. 293-94

50. क्रेग-यूरोप सिंस 1815, पृ० 703 51. टेलर-द ओरिजिन्स ऑफ द सेंकण्ड वर्ल्ड वार, पृ० 82 52. हेजन-माडर्न यूरोपियन हिस्ट्री, पृ०

53. गेधार्न हार्डी- ए शार्ट हिस्ट्री ऑफ इन्टरनेशनल अफेयर्स, पृ० 387 54. लैंगसम-द वर्ल्ड सिंस 1919, पृ० 52

55. कार- ‘इन्टरनेशनल रिलेशन्स बिटवीन द टू वर्ल्ड वार्स’, पृ० 217 56. गेयान हार्डी-ए शार्ट हिस्ट्री ऑफ इन्टरनेशनल रिलेशन्स, पृ० 399

57. Jackson – The Between War World, P-142 58. कार-इन्टरनेशनल रिलेशन्स बिटवीन द टु वर्ल्ड वार्स, पृ० 229 59. चर्चिल-द सेकन्ड वर्ल्ड वार, खण्ड एक, पृ. 175

60. बैन्स – यूरोप सिंस 1914, पृ० 417 61. अर्नाल्ड टायची- सर्वे ऑफ इन्टरनेशनल अफेयर्स (1937) खण्ड-1, पृ० 46

62, हेज-ए पोलिटिकल एण्ड कल्चरल हिस्ट्री ऑफ माडर्न यूरोप, खण्ड-2, पृ० 733 63. चर्चिल-वही, पृ० 244 64. गेयान हार्डी-वही, पृ. 386

65. चर्चिल-सेकन्ड वर्ल्ड वार (भाग – 1), पृ० 273 66. गेधार्न हार्डी-पृ० 468-69 67. शुमां-इन्टरनेशनल पालिटिक्स, पृ० 571

68. डेविड थामसन-यूरोप सिंस नेपोलियन, पृ० 706 69. चर्चिल-सैकन्ड वर्ल्ड वार (भाग-1), पृ० 273

जापान में सैन्यवाद का उदय (Rise of Militarism in Japan)

सातवीं शताब्दी तक जापान बहुत से छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त था और ये सब छोटे राज्य एक जापानी सम्राट की अधीनता को स्वीकार करते थे । जापान में राजा के इन अधिकारियों और कर्मचारियों को अपना निर्वाह करने के लिए जागीर देने की प्रथा थी । इसका परिणाम यह हुआ कि जापान में सामन्त पद्धति का विकास हुआ, जिसके परिणामस्वरूप जापान में एक ऐसी श्रेणी का निर्माण शुरू हुआ, जिसका कार्य ही सैनिक सेवा था । बारहवीं शताब्दी में सम्राट योरीतोमा के समय से जापान में शक्तिशाली सामन्तों का काल आरम्भ होता है। इसका कानूनी ढाँचा तया मूल आधार 1232 की ‘जोई संहिता’ (Code of Joei) के अनुसार निर्धारित किया गया । इस समय से “शोगुन” का पद एक महत्त्वपूर्ण सैनिक पद माना जाने लगा, जो सेना का सर्वोच्च अधिकारी होता था । राजा इस शोगून के माध्यम से ही शासन व्यवस्था चलाता था ।

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