बोल्शेविक क्रांति से रूस में क्या प्रभाव पड़ा ?

बोल्शेविक क्रांति से रूस में क्या प्रभाव पड़ा ?

बोल्शेविकों के भयंकर परनामी को लाल आतंक और उनके विरोधियों के कुकृत्यों को श्वेत आतंक जाता था। जुलाई 1918 में सम्राट निकोलस द्वितीय और उसक परिवार के वाका हत्या कर दी गई। चारों ओर हत्या, लूट, आगजनी, हिसा आदि की हा रही थी। बोल्योविकों ने विद्रोही सेनापतियों को पराजित किया । म्यूनिख को पराजित करके पेट्रोग्राड की सुरक्षा की । मित्र-राष्ट्रों ने रुस १क बहिष्कार करके उसकी आर्थिक समस्याएँ और भी बढ़ा दी थी। इस सका एक भयंकर अकाल का सामना भी करना पड़ा । परन्तु लेनिन रूसियों का मार्ग सफलतापूर्वक प्रशस्त करता रहा।

बोलोविकों ने आन्तरिक विद्रोह का दमन

इसके साथ ही बोलोविकों ने आन्तरिक विद्रोह का दमन भी किया प्रकार फ्रांस की राज्य क्रान्ति के समय जेकोबिन ने फ्रांस में आतंक के सष्टि करके अपनी शक्ति को मजबूत किया था, उसी प्रकार बोल्योविक ने भी विरोधियों का अन्त करके और विरोधियों में आतंक फैलाने के हिंसात्मक मा का प्रयोग किया । रुस में ‘चेका’ (Cheka) नाम एक विशेष न्यायालय की स्था की गई और इसके द्वारा लगभग दस हजार व्यक्तियों को दण्डित किया गया इसके अध्यक्ष फेलिक्स डेरजिस्की का यह विश्वास था कि सर्वहारा वर्ग की शक्ति प्रदर्शन करने के लिए आतंकवादी नीति अपनाना आवश्यक था । ‘चेका क्रान्तिकारियों के विरोध को समाप्त करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया ।

इस प्रकार तीन वर्षों के भयंकर संघर्ष के पश्चात् प्रतिक्रान्तिकारियों तथा विदेशी राज्यों से उत्पन्न संकट समाप्त हो गया । अतः जो बोल्शेविक क्रान्ति आरम्भ में रक्तहीन थी, वह अन्त में इतिहास की ‘अति खूनी’ एवं भयंकर क्रान्ति सिद्ध हुई।

नवीन बोल्शेविक सरकार-

नवम्बर, 1917 में स्थापित हुई साम्यवादी सरकार ने 1918 में नवीन संविधान अपनाया । इसके प्रमुख अंग निम्न प्रकार थे

(1) अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस प्रत्येक नगर, ग्राम तथा जिले के मजदूरों तथा किसानों की स्थानीय कौन्सिल (Soviet) होती थी। 18 वर्ष से अधिक आयु के प्रत्येक नागरिक को, जो मेहनत से अपनी आजीविका प्राप्त करता था, को वोट देने का अधिकार प्राप्त था । ये सोवियत प्रान्तीय सोवियत के लिए प्रतिनिधि चुनती थी, जो बाद में केन्द्रीय सोवियत कांग्रेस का चुनाव करते थे । अखिल रुसी सोवियत कांग्रेस में स्थानीय तथा प्रान्तीय सोवियटर्स के प्रतिनिधियों की संख्या लगभग तेरह सौ थी। इनके पास राज्य की सर्वोच्च शक्ति थी।

(II) अखिल रूसी केन्द्रीय व्यवस्थापिका-

अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस केन्द्रीय व्यवस्थापिका का निर्वाचन करती थी जिसके सदस्यों की संख्या लगभग दो सौ थी। कानून पास करने का काम इसी का था। बाद में अखिल रूसी सोवियत कांग्रेस ३१ कानूनों को अन्तिम स्वीकृति देती थी।

(III) मन्त्रिमण्डल (People’s Commissors)-

केन्द्रीय व्यवस्थापिका मन्त्रिमण्डल की चुनाव करती थी । प्रत्येक विभाग के मंत्री को कामीसार (Commissor) कहा जाता था। इस प्रकार बोल्योविक शासन नीचे से ऊपर की ओर बढ़ता था । वह विशाल पिरामिड के समान था, जिसका आधार हजारों सोवियतें थी और केन्द्रीय सरकार अपनी सब शक्ति इन स्थानीय सोवियतों से प्राप्त करतीय शासन के क्षेत्र में यह एक नया परीक्षण था। 1936 ई० में इस सावधान हजारों सोवियतें थीं और जिसकी 1936 ई० में इस संविधान के स्थान नक नवीन संविधान अपनाया गया ।

रूस का आर्थिक एवं सामाजिक पुनर्निर्माण

1020 में सुप्रसिद्ध अंग्रेज लेखक एच.जी. वेल्स ने रूस की यात्रा की थी  एक पुस्तक लिखी थी-‘अन्धकारग्रस्त रूस’ । रूस में जो भयानक तबाही और गरीबी छायी हुई थी उसके सम्बन्ध में वेल्स ने लिखा था, “अंग्रेज या पीली पाठक उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता । यह एक कटु सत्य था कि सारा देश सचमुच राख और खण्डहरों का ढेर बना हुआ था । पहले हायड और फिर गृहयुद्ध के वर्षों में आबादी में 2 करोड़ की कमी हो गयी थी। 1000ई० में भारी उद्योगों का कुल उत्पादन 1913 के मुकाबले सातवें हिस्से जितना, सूती कपड़ों का उत्पादन उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य जितना और कच्चे लोहे का उत्पादन 200 वर्ष पहले जितना ही रह गया था । परिवहन व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो चुकी थी। कृषि उत्पादन आधा ही रह गया था | सभी आवश्यक वस्तुओं की भारी कमी थी । इस बरबादी और तबाही के लिए एकमात्र उत्तरदायी अन्तर्राष्ट्रीय साम्राज्यवाद और आन्तरिक प्रतिक्रान्ति थी।”
ऐसी कठिन और भीषण परिस्थितियों में सोवियत जनता को पुनर्निर्माण का कार्य आरम्भ करना पड़ा । किन्तु लेनिन के कुशल नेतृत्व में कुछ ही वर्षों में रूस प्रगति के पथ पर अग्रसर हो गया ।

युद्धकालीन साम्यवाद (War Communism 1918-21) –

गृह-युद्ध के दौरान सोवियत शासन ने जो नीति अपनायी, उसे ‘युद्ध-साम्यवाद के नाम से जाना जाता है । यह नीति जुलाई, 1918 से मार्च, 1921 तक लागू रही । बोल्शेविकों ने सत्ता हस्तगत करते ही मार्क्स के सिद्धान्तों के अनुकूल आर्थिक व्यवस्था लागू करने का प्रयास आरम्भ कर दिया । साथ ही शान्ति स्थापना के लिए सबसे पहले जो काम करना था, वह था शहर और गाँव के बीच समुचित आर्थिक सम्बन्धों की स्थापना ।

युद्ध के समय ये सम्बन्ध कट बन गये थे। इस समस्या को हल किये बिना अथव्यवस्था का पुनरुद्धार तथा विकास असम्भव था। जैसे पहले किया करते किसानों से जबरदस्ती अनाज लेने की नीति-नयी नीति के अनुसार सर्व प्रथम जमादारों से छीन कर राज्य की भूमि घोषित कर दी गयी और फिर उसको मबाट दिया। अब किसान अपने-अपने खेतों में उसी प्रकार काम करने
पहले किया करते थे। सरकार को यह हक था कि वह किसान के पास क खाने लायक अनाज छोडकर बाकि अनाज उससे प्राप्त कर सके । उसे अब को कोई कर नहीं देना पड़ता था। सरकार लगान अनाज के रुप में प्राप्त पा किन्तु उस समय रूस का किसान अपना उत्पादन काले बाजार में बेचना जहा उसे अधिक दाम प्राप्त हो सकते थे । सरकार ने इस प्रवृत्ति को
जींदारों को कोई कर नहा करती थी किन्तु उस समय रूस चाहता था, जहाँ उसे अधिक के अनाज को जल सजा दी गई रोकने के लिए श्रमजीवियों की सशस्त्र टुकड़ियों को किसानों के अनाज करने के लिए भेजने लगी। अनाज का संग्रह करने वालों को कठोर सजाही इससे रूस में असंतोष बढ़ा । मार्च, 1921 में नयी कर-प्रणाली लाग जिसके अनुसार कर निर्धारण सम्पत्ति के परिमाण के अनसार अर्थात, गरीब किसान से कुछ नहीं, और अमीर किसान (कलका से, अधिक ।

कर-प्रणाली लागू की गई किन्तु गृह युद्ध के कारण हजारों एकड़ भूमि पर खेती नहीं की जा सकी। इसके अतिरिक्त बोल्शेविक सरकार की बलपूर्वक अनाज लेने की नीति के कृषकों के विरोध के कारण भी कृषि उत्पादन राष्ट्रीय आवश्यकता से बहत कर रहा था । 1916 ई० में जहाँ 7,40,00,000 टन अनाज उत्पन्न हुआ था, वी 1917 ई० में उपज 3,00,00,000 टनं ही रह गयी और देश में भूखमरी स्थिति उत्पन्न हो गयी ।

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