रूस-जापान युद्ध वस्तुतः आंग्ल-जापानी सन्धि का परिणाम

रूस-जापान युद्ध वस्तुतः आंग्ल-जापानी सन्धि का परिणाम

उसने विद्रोह समाप्त हो जाने के पश्चात् भी अपनी सेनाएँ उस क्षेत्र में ही रखी और ऐसा प्रतीत होता था कि वह उस क्षेत्र पर अपना स्थायी आधिपत्य बनाये रखने के लिये कृत संकल्प है | जापान ने इसका विरोध किया। इस समय तक अमेरिका की सुदूर पूर्व में रुचि जागृत हो चुकी थी। उसने चीन के अन्य क्षेत्रों की भाँति मंचूरिया में भी प्रादेशिक अखण्डता के सिद्धांत तथा ‘मुक्त द्वार नीति को लागू करने का प्रयास किया । अमेरिका के राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट ने जर्मनी तथा फ्रांस को यह चेतावनी दे दी थी कि अगर वे सन् 1895 की तरह जापान का मिलकर विरोध करेंगे तो अमेरिका जापान का साथ देगा।

मंचूरिया में प्रादेशिक अखण्डता के सिद्धांत

रूस-जापान युद्ध वस्तुतः आंग्ल-जापानी सन्धि का परिणाम था । बाक्सर विद्रोह के बाद रूस मंचूरिया में किसी न किसी बहाने अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता था। अन्य साम्राज्यवादी देशों ने इसका विरोध किया | रूस से सबसे अधिक खतरा ब्रिटेन तथा जापान को था | 1902 की सन्धि के कारण रूस ने अपनी मंचूरिया सम्बन्धी नीति में कुछ परिवर्तन किये | 1902 के मंचूरिया समझौते के अनुसार रूस ने मंचूरिया से अपनी सेना हटाने का वादा किया, लेकिन वह इस वादे को पूरा करने के लिए तैयार नही था । वह सिर्फ मंचूरिया के एक कोने से अपनी सेना हटा कर दूसरे कोने में इकट्ठा कर देता था। कुछ दिनों पश्चात् रूस ने अपनी सेनाएँ हटाने से इनकार कर दिया | उसने चीन से यह माँग भी की कि वह रूस को मंचूरिया में आर्थिक एकाधिपत्य स्थापित करने की अनुमति दे दे।

मंचूरिया के साथ ही रूस कोरिया में भी अपना प्रभाव स्थापित करना चाहता था । अतः जापान को खतरा दिखायी देने लगा । जापान कभी भी यह सहन नहीं कर सकता था कि कोरिया में रूस के प्रभाव का विस्तार हो । जापान ने रूस को सुझाव दिया कि रूस इस बात को स्वीकार कर ले कि कोरिया में जापान के विशेष स्वार्थ है और इसके बदले में जापान मंचूरिया में रूस के विशेष स्वार्थ को मानने को तैयार था । लेकिन रूस ने इस सुझाव को नही माना, अतः दोनों देशों के बीच राजनीतिक सम्बन्ध टूट गये । युद्ध की घोषणा किये बिना ही जापान ने फरवरी, 1904 में अचानक आक्रमण कर दिया, जिसके कारण उसे कुछ प्रारम्भिक लाभ प्राप्त हुए।

जापान को इंग्लैण्ड और अमेरिका से सहायता प्राप्त

एक वर्ष तक यह युद्ध जारी रहा । यह एक विचित्र युद्ध था। एक ओर, यह युद्ध रूस तथा जापान की भूमि पर नही लड़ा जाकर चीन की भूमि पर लड़ा गया और दूसरी ओर यह रूस तथा जापान के स्थान पर उन शक्तियों के धन से लड़ा गया, जिन्होंने इसमें भाग नही लिया । इस युद्ध में जापान को इंग्लैण्ड और अमेरिका से सहायता प्राप्त हो रही थी तथा रूस को भी फ्रांस तथा जर्मनी से पयाप्त धन व सैनिक सामग्री प्राप्त हुई। इसके अतिरिक्त इस युद्ध में अनहोनी बात यह हुई कि एक महान् यूरोपीय शक्ति की पराजय एक पूर्वी शक्ति द्वारा हई, यद्यपि वही पूर्वी शक्ति केवल 50 वर्ष पहले केवल धनुषबाणों से युद्ध किया करती थी। जहाँ तक दोनों देशों के आकारों और साधनों का सम्बन्ध था, यह युद्ध वास्तव में राक्षस और बौने के बीच युद्ध था | स्थल युद्धों में तो यही प्रतीत होता था कि एक बौना केवल अपने अदम्य साहस और अद्भुत रण-कौशल से भारी भरकम देव को पछाड़ रहा था ।

पोर्टस्माउथ की सन्धि

अमेरिकी राष्ट्रपति की मध्यस्थता के फलस्वरूप इस युद्ध का अन्त हुआ और 5 सितम्बर, 1905 को पोर्टस्माउथ की सन्धि हुई। इस सन्धि के द्वारा –

(i) कोरिया में जापान के प्रधान राजनीतिक, सैनिक तथा आर्थिक हितों को मान्यता प्रदान की गई;

(ii) रूस ने अपने अधीनस्थ लियोओंतुंग प्रदेश के पट्टे को जापानियों को हस्तान्तरित कर दिया और दक्षिणी मंचूरिया की अपनी रेल व्यवस्था तथा खानों के विकास के विशेषाधिकार जापान को दे दिया ।

(i) रूस ने काराफूतों (सखालीन का दक्षिणी आधा भाग जापान को दे दिया) I

(iv) रूस ने अपने द्वीपों के उत्तरी एवं पश्चिमी समुद्रों में मछली पकड़ने के कुछ विशेषाधिकार जापान को सौपे ।

(१) दोनों देश परस्पर युद्धबन्दियों पर व्यय की गई धनराशि देने पर सहमत हुए।

हो गये, जिसमें जापान को रूस की अपेक्षा लगभग दो करोड़ डालर अधिक प्राप्त यह युद्ध जापान की दूसरी बड़ी सैनिक सफलता थी । युद्ध आरम्भ होने से पूर्व जापान ने जितनी आशा की थी, उससे अधिक लाभ प्राप्त हुआ । इंग्लैण्ड के लिए खुशी की बात थी कि उसका शत्रु रूस पराजित हुआ । इस युद्ध के बाद जापान की गणना संसार के शक्तिशाली राष्ट्रों में होने लगी । जापान की विजय से एशियावाद के नारे का जन्म हुआ ‘एशिया, एशियावालों के लिए है । इस युद्ध का प्रभाव रूस पर भी पड़ा । रूसी निरंकुश शासन का खोखलापन विश्व के सामने प्रकट हो गया । अब रूस का, चीन की और विस्तार रुक गया । हंस कोहन ने ‘ए हिस्ट्री आफ नेशनलिज्म इन द ईस्ट में जापान की इस विजय के सम्बन्ध में लिखा है, “जापान जैसे छोटे देश ने सैनिक शक्ति में रूस सदृश अत्यन्त शक्तिशाली राष्ट्र को भी पराजित कर दिया, जो सदियों से निरन्तर एक के बाद दूसरे एशियाई देश को लाइस्ट में जापान की सबा हंस कोहन नेहा गया ।पराजित करने में संलग्न था ।

इस वास्तविकता ने एशिया की राजनीतिक विचारधारा में एक क्रान्ति उत्पन्न कर दी क्योंकि पहली बार ही ऐसा आभास मिला कि यूरोपीय देशों की विजयपूर्ण प्रगति का मार्ग अवरुद्ध हो गया। प्रथम विश्व युद्ध और जापान – प्रथम महायुद्ध के पूर्व जापान के साम्राज्य में दक्षिणी सखालीन, रिक्युक्यु द्वीप, लियोओतुंग, कोरिया तथा दक्षिणी मंचूरिया क प्रदेश सम्मिलित हो चुके थे। प्रथम विश्व युद्ध जापान के लिए एक अच्छा अवसर था । जापान ने 1914 से पूर्व तक अपूर्व आर्थिक प्रगति कर ली थी। फारमोसा से चीनी तम्बाकू और रूई कच्चे माल के रूप में प्राप्त होती थी। 1910 में जापान ने कोरिया पर अधिकार करके उसे अपने अधीन कर लिया था । जापान में पूँजीवादी प्रवृत्ति बढ़ रही थी। वे चीन में भी अपना आर्थिक साम्राज्य स्थापित करने का स्वप्न देख रहे थे । प्रथम विश्व युद्ध में जापान को यह अवसर प्राप्त हुआ क्योंकि 1917 तक अमेरिका को छोड़कर कोई भी यूरोपीय देश जापान की शक्ति का विरोध करने की स्थिति में नहीं था।

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *