शैक्षिक विकास के बहुस्तरीय ढाँचे के रूप में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1988) का मूल्यांकन

शैक्षिक विकास के बहुस्तरीय ढाँचे के रूप में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1988) का मूल्यांकन

शिक्षा की उचित प्रबन्ध संरचना में अखिल भारतीय सेवा के रूप में भारतीय शिक्षा सेवा (I.E.S) की स्थापना की जायेगी । शैक्षिक नियोजकों, प्रशासकों एवं संस्था प्रधानों के प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान दिया जायेगा ।

शैक्षिक विकास के बहुस्तरीय ढाँचे के रूप में योजना, समन्वय, निरीक्षण एवं मूल्यांकन के केन्द्र, राज्य, जिला एवं स्थानीय स्तर के अभिकरण सहभागी होंगें ।

गैर सरकारी एवं स्वेच्छिक प्रयासों को उचित प्रबन्धन एवं वित्तीय सहायता देने के लिए प्रोत्साहित किया जायेगा । साथ ही शिक्षा के व्यावसायीकरण के रूप में संस्थाओं की स्थापना को रोकने के लिए कदम उठाये जायेंगें ।

17.3.1.11 संसाधन तथा समीक्षा

दान, उपहार, शुल्क एवं सुविधाओं के अधिकतम तथा कुशल उपयोग के रूप में संसाधनों का अधिकतम विकास किया जायेगा | अनुसंधान एवं तकनीकी और वैज्ञानिक जनशक्ति के विकास में लगी हुई संस्थाएं, उन संस्थाओं से जिन्हें वे अपनी सेवाएं प्रदान कर रही है, कर अथवा शुल्क वसूली के रूप में संसाधन जुटा सकती है ।

राष्ट्रीय विकास एवं संरक्षा के लिए शिक्षा के क्षेत्र में विनियोग महत्वपूर्ण क्षेत्र होगा । आठवीं पंचवर्षीय योजना से शिक्षा में विनियोग कुल राष्ट्रीय आय का 6 प्रतिशत से अधिक सुनिश्चित किया जायेगा । इस नीति के विभिन्न प्रावधानों के क्रियान्वयन की समीक्षा प्रत्येक पांच वर्ष में की जानी चाहिए । क्रियान्वयन में हुई प्रगति एवं समय समय पर दृष्टिगोचर प्रवृत्ति का पता लगाने के लिए थोड़े-थोड़े अन्तराल पर मूल्यांकन होना चाहिए ।

17.3.1.12 भावी स्वरूप

भारत में शिक्षा का भावी स्वरूप इतना जटिल होगा कि इसको ठीक-ठीक आंकना सम्भव नहीं होगा । यद्यपि हमें अपनी परम्पराओं के अनुसार मानसिक एवं आध्यात्मिक लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु अधिक ध्यान देना होगा । मुख्य कार्य शिक्षा प्रणाली के निचले स्तर को सुदृढ़ करना है, जिसमें इस सदी के अन्त तक लगभग एक अरब लोग होंगें । साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षा प्रणाली में सर्वोच्च स्तर के लोग विश्व के श्रेष्ठतम व्यक्तियों में सम्मिलित हो । अब यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि शिक्षा को सम्पूर्ण राष्ट्र में मानव संसाधनों के विकास के लिए विभिन्न प्रकार की भूमिकाएँ निभानी होगी ।

17.4 राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1988) का मूल्यांकन

| अब तक घोषित शिक्षा नीतियों एवं शिक्षा सम्बन्धी सुझावों में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है । इस नीति में पूर्व की शिक्षा नीतियों में सम्मिलित महत्वपूर्ण बातों को तो नवीन परिस्थितियों के अनुरूप सम्मिलित किया ही गया है, साथ ही राष्ट्रीय एवं सामाजिक विकास से सम्बन्धित कई नये तथ्यों को भी सम्मिलित किया गया है ।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) में शिक्षा को एक महत्वपूर्ण विनियोग के रूप में माना है। जो राष्ट्रीय विकास, आर्थिक, सामाजिक एवं तकनीकी विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है । इस शिक्षा नीति में शिक्षा में एकरूपता लाने के लिए राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली पर जोर दिया गया है जिसके अनुसार सम्पूर्ण देश में 10+2+3 शिक्षा प्रणाली लागू करने की बात कही गई है । शैक्षिक अवसरों की समानता, शैक्षिक गुणवत्ता में तुलनीयता, शिक्षा में केन्द्र का अधिक दायित्व, उच्च शिक्षा में स्वायत्ता आदि प्रावधान शिक्षा के क्षेत्र में मील का पत्थर सिद्ध हो सकेंगें । कम्प्यूटर एवं तकनीकी शिक्षा तथा विज्ञान और गणित की शिक्षा पर जोर देने की बात से देश विश्व के विकसित देशों के साथ खड़ा होने के योग्य बन पायेगा । शिक्षा के साथ व्यवसाय को जोड़ने से बेरोजगारी को दूर करने में सहायता मिलेगी । ग्रामीण विश्वविद्यालय, दूरस्थ शिक्षा, खुला विद्यालय तथा खुला विश्वविद्यालय के माध्यम से वंचित एवं कामकाजी लोगों को अध्ययन की सुविधा मिल सकेगी । नवोदय विद्यालयों की स्थापना से ग्रामीण क्षेत्र के प्रतिभाशाली बालकों की प्रतिभा का उपयोग हो सकेगा ।

परन्तु नई शिक्षा नीति में निजी क्षेत्र को प्रधानता देने के कारण शिक्षा के महंगी होने के आसार बढ़ रहे हैं । वर्तमान में यह बात दृष्टिगोचर होने लगी है । निजी क्षेत्र के बढ़ते हुए दखल से शिक्षा के सम्बन्ध में दिये गये मूल लक्ष्य से हम भटक रहे हैं । बहुत से लोग नई शिक्षा नीति को नई बोतल में पुरानी शराब की संज्ञा देते हैं । उनके अनुसार नई शिक्षा नीति (1986) में सम्मिलित अधिकांश प्रावधान पूर्व में घोषित शिक्षा नीतियों में भी सम्मिलित थे । आवश्यकता इन प्रावधानों को सुचारू रूप से लागू करने की है ।

17.5 संशोधित राष्ट्रीय शिक्षा नीति एवं कार्यान्वयन कार्यक्रम (1992)

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986 ) की घोषणा कांग्रेस पार्टी के शासनकाल में हुई थी । इसके बाद केन्द्र में श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा (छक्) सरकार का गठन हुआ तथा इसी के साथ शैक्षिक क्षेत्र में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986 ) में परिवर्तन की मांग उठने लगी । 7 मई, 1990 को आचार्य राममूर्ति की अध्यक्षता में एक 17 सदस्यीय समिति का गठन राष्ट्रीय शिक्षा नीति की समीक्षा करने के सम्बन्ध में किया गया । समिति ने अपनी रिपोर्ट में सार्वजनिक स्कूल प्रणाली, शिक्षा का विकेन्द्रीकरण, मूल्यपरक शिक्षा तथा व्यावसायिक शिक्षा एवं रोजगारपरक शिक्षा जैसी सिफारिशें की, परन्तु इस समिति की सिफारिशों को लागू करने से पूर्व ही राष्ट्रीय मोर्चा सरकार का पतन हो गया और केन्द्र में पुन: कांग्रेस दल का शासन स्थापित हो गया ।

जनार्दन रेड्डी समीक्षा समिति

। जुलाई, 1991 में आन्ध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री एन. जनार्दन रेड्डी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया, जिसका कार्य शिक्षा नीति (1986) की समीक्षा कर उसके क्रियान्वयन के लिए सुझाव देना था । इस समिति की सिफारिशों पर केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार परिषद् की बैठक में विचार किया गया, जिसमें कतिपय संशोधनों के साथ शिक्षा नीति के कार्यान्वयन हेतु संशोधित कार्यान्वयन कार्यक्रम तैयार किया गया । इसे कार्यान्वयन कार्यक्रम (1992) कहा गया ।

भारत सरकार द्वारा कार्यान्वयन कार्यक्रम (1992) के अन्तर्गत शिक्षा नीति (1986) के विभिन्न पक्षों में निम्नलिखित संशोधन किये गये । राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली सम्पूर्ण भारत वर्ष में +2 स्तर को स्कूल शिक्षा के अंग के रूप में स्वीकार करने की बात कही गई।

समानता के लिए शिक्षा

इस हेतु समग्र साक्षरता अभियान पर बल दिया गया । साक्षरता अभियान को गरीबी निवारण, राष्ट्रीय एकता, पर्यावरण संरक्षण, छोटे परिवार, नारी शिक्षा, प्राथमिक शिक्षा का सार्वजनीकरण आदि से जोड़ने की बात की गई । शिक्षा को व्यवसाय तथा रोजगार से जोड़ने की बात भी कही गई ।

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *