हिटलर की साम्राज्यवादी नीति और म्यूनिख समझौता

हिटलर की साम्राज्यवादी नीति और म्यूनिख समझौता

इस अतिक्रमण के सम्बन्ध में गेथोर्न हार्डी ने लिखा है कि इससे और कैफ का कार्यक्रम, महत्त्वपूर्ण सामरिक और आर्थिक लाभ प्राप्त हो जाने के कारण, पूर्ति के बहुत निकर पहुँच गया था, इटली, हंगरी और युगोस्लाविया के साथ सीधा सम्पर्क स्थापित हो गया और चेकोस्लोवाकिया के बोहीमियन और मोरेवियन जिले ऐसे घिर गये थे, जैसे कैची फलकों में जर्मन सेना के लिए सुलभ मनुष्य शक्ति भी बढ़ गई क्योंकि राइख की आबादी 67 लाख बढ़ गई। उसके आन्तरिक साधनों में भी वृद्धि हुई, जिससे उसकी आत्म निर्भरता परिवर्धित हो गई।64 हिटलर ने जितनी सरलता से आस्ट्रिया का अपहरण कर, लिया उससे उसका आत्म विश्वास बढ़ा और वह पश्चिमी राष्ट्रों के विरोध की उपेक्षा करके अपनी अन्य विस्तारवादी योजनाओं को पूरा करने की ओर अग्रसर हुआ।

10. चेकोस्लोवाकिया का संकट –

म्यूनिख समझौता – यह स्पष्ट था कि आस्ट्रिया के पश्चात् चेकोस्लोवाकिया ही हिटलर की साम्राज्य लिप्सा का शिकार होगा । समस्त जर्मन नस्ल के लोगों को जर्मन साम्राज्य में मिलाने तथा पूर्वी यूरोप में जर्मन साम्राज्य का विस्तार करने की हिटलर की योजना में चेकोस्लोवाकिया का महत्त्वपूर्ण स्थान था। 20 फरवरी, 1938 को राइखस्टेग के समक्ष बोलते हुए, हिटलर ने अप्रत्यक्ष रूप से चेकोस्लोवाकिया के जर्मनों की वैयक्तिक, राजनैतिक एवं वैचारिक स्वतन्त्रता के अधिकार की रक्षा करना जर्मन साम्राज्य का विशेष कर्तव्य माना था। यथार्थ में आस्ट्रिया के विलय के बाद चेकोस्लोवाकिया की स्थिति चिन्ताजनक हो गई थी क्योंकि वह दोनों ओर से जर्मन साम्राज्य की सीमा से घिर गया था । राइनलैण्ड के पुनः सैन्यीकरण हो जाने से उसका मित्र फ्रांस भी उसे सीधी सैनिक सहायता नहीं भेज सकता था। पोलैण्ड और रूमानिया की अवरोधक सीमा नीति के कारण उसे रूस से भी सैन्य सामग्री मिलाना कठिन था। ब्रिटिश सरकार की ‘तुष्टीकरण की स्थिति के कारण ब्रिटेन की ओर से भी किसी प्रकार की सक्रिय सहायता की आशा नहीं की जा सकती थी । अतः हिटलर की आक्रामक योजना को कार्यान्वित करने का यही सबसे उपयुक्त अवसर था । चेकोस्लोवाकिया का निर्माण मित्र राष्ट्रों के द्वारा किया गया था । यहाँ मुख्यतः दो जातियाँ निवास करती थी

पोलैण्ड और रूमानिया की अवरोधक सीमा नीति

चैक तथा स्लाव  दोनों जातियों का रहन सहन एक सा था। इसके अतिरिक्त यहाँ 35 लाख जर्मन, 5 लाख रूमेनियन, 8 लाख हंगेरियन और 7 हजार पोल भी निवास करते थे। जर्मन लोग सूडेटनलैण्ड (Sudetenland) में निवास करते थे । हिटलर ने सूडेटनलैण्ड निवासी जर्मनों को स्वायत्त शासन प्रदान करने की माँग की परन्तु चेक सरकार ने इसका विरोध किया और युद्ध की तैयारी आरम्भ कर दी। 1938 ई० में चेकोस्लोवाकिया की राजनीतिक स्थिति में तनाव उत्पन्न हो गया । फ्रांस ने चेकोस्लोवाकिया को सलाह दी कि वह तनाव कम करने के लिए सूडेटनलैण्ड में रहने वाले जर्मनों को कुछ सुविधायें दे । रूस ने भी कहा कि वह जर्मन आक्रमण के विरुद्ध चेक लोगों की सहायता करेगा । ब्रिटिश सरकार इस मामले को दूसरी तरह से देख रही थी। उसी समय हिटलर ने सैन्य प्रदर्शन कर परिस्थितियों को जटिल बना दिया ।

हिटलर के पास चेकोस्लोवाकिया को अपने अधिकार में करने के अनेक कारण थे

(1) इसका सामरिक महत्त्व था।

(1) शक्तिशाली चेक सेना जर्मनी के अस्तित्व को संकट में डाल सकती थी। भाँप चुका था।

(iii) चेकोस्लोवाकिया के मित्र उसकी समय पर मदद नहीं करेंगे, यह बात हिटलर

(iv) चेकोस्लोवाकिया संसदात्मक राज्य था और राष्ट्रसंघ का सदस्य था, अत: जर्मनी और उसकी नीतियाँ आपस में टकराती थी।

इस प्रकार हिटलर चेकोस्लोवाकिया के विरुद्ध कठोर कार्यवाही करना चाहता था। हिटलर द्वारा चेकोस्लोवाकिया पर प्रत्यक्ष आक्रमण सम्भव नहीं था क्योंकि फ्रांस और रूस उसे सहायता का वचन दे चुके थे। हिटलर ने चेकोस्लोवाकिया पर सीधा आक्रमण न करके उसने चेकोस्लोवाकिया में उपद्रव करवा कर अपना उद्देश्य पूरा करने का निश्चय किया । उसने  चेकोस्लोवाकिया के जर्मन आबादी वाले सूडेटन प्रदेश के जर्मनी की ओट में काम शुरू किया । सूडेटन प्रदेश के जर्मन लोगों का नेता था कोनई हेनलिन हिटलर ने हेनलिन को निर्देश दिया कि वह सूडेटन क्षेत्र के समस्त जर्मनों को संगठित करके चेक सरकार को परेशान करना शुरू कर दे ।

सूडेटन प्रदेश पर अधिकार

इस निर्देश के अनुसार हेनलिन ने चेकोस्लोवाकिया में स्थित सभी जर्मनों से अपने दल में सम्मिलित होने की अपील की और चेकोस्लोवाकिया मन्त्रिमण्डल के जर्मन सदस्यों से त्याग पत्र दिलवाने में भी सफल रहा । इसके बाद हेनलिन की माँगें बढ़ती गई। दूसरी तरफ हिटलर ने समाचार पत्रों के माध्यम से चेकोस्लोवाकिया सरकार पर जर्मनों पर अत्याचार करने का दोष लगाकर उसके विरुद्ध जहरीला प्रचार करना शुरू किया, जिससे समस्या नाजुक बन गई । चेक सरकार ने सूडेटन जर्मनों के अन्य दलों के साथ मिलकर एक नया समझौता कर लिया किन्तु हेनलिन के दल ने समझौते को ठुकरा कर सूडेटन जर्मनों के लिए स्वायत्तता एवं समानता की माँग की । चेक सरकार इस प्रकार की माँग को स्वीकार करने को तैयार नहीं थी । इस प्रकार सूडेटन जर्मनों की समस्या एक अन्तर्राष्ट्रीय समस्या बन गयी । वास्तव में हिटलर सूडेटन जर्मनों और चेकोस्लोवाकिया के मध्य विद्यमान तनाव को और अधिक बढाना चाहता था ताकि पीड़ित जर्मनों” का पक्ष लेकर उसे कार्यवाही करने का अवसर मिल सके।

24 अप्रैल, 1938 को हेनलिन ने चेक सरकार के सम्मुख मांग रखी। इन माँगों में जर्मन लोगों को चेकों के साथ पूर्ण समानता, जर्मन क्षेत्रों का परिसीमन, उन क्षेत्रों में जर्मनों को स्वायत्त शासन, 1918 ई० के बाद से चेक सरकार की नीतियों के परिणामस्वख्य जर्मनों को जो हानि उठानी पड़ी, उसका मुभावना आदि मुख्य थी। चेक सरकार इन मांगों को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं थी। हिटलर ने चेकोस्लोवाकिया के विषय मुसोलिनी से भी सहायता चाही। इसी बीच मई के तीसरे सप्ताह में चेक सरकार ने अपनी सेना को आंशिक लामबन्दी का आदेश दिया । उसी समय ब्रिटेन और फ्रांस की सरकारों ने, हिटलर और रिबेनटाप को, चेक राज्य पर सैनिक आक्रमण करने के विरूद्ध चेतावनी दी । रूस ने भी फ्रांस के साथ मिलकर, चेक सरकार को तुरन्त सहायता देने का आश्वासन दिया । हिटलर उस समय तीनों बड़ी शक्तियों का सम्मिलित रूप से सामना करने की स्थिति में नही था, अतः उसने घोषणा की कि चेकोस्लोवाकिया पर आक्रमण करने का उसका कोई इरादा नहीं है।

इंग्लैण्ड का प्रधानमन्त्री चैम्बरलेन तुष्टीकरण की नीति के द्वारा इस समस्या को सुलझाना चाहता था ।

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