चेकोस्लोवाकिया का अंग-भंग

चेकोस्लोवाकिया का अंग-भंग

उसने बहुत पहले ही घोषणा की थी कि “आस्ट्रिया की स्वाधीनता बहुत महत्त्वपूर्ण है । यदि आस्ट्रिया का पतन होता है, तो चेकोस्लोवाकिया की रक्षा नहीं की जा सकती है, तब वह समस्त बाल्कन प्रदेश एक नये दैत्याकार प्रभाव के सामने झुक जाने के लिए विवश हो जायेगा।”

आत्मनिर्णय के सिद्धान्त के आधार पर सूडेटनलैण्ड पर अधिकार

इसमें सन्देह नहीं कि चेकोस्लोवाकिया, फ्रांस और रूस के साथ पारस्परिक सहायता की सन्धियों से बँधा था । ब्रिटेन का दृष्टिकोण सहानुभूतिपूर्ण था । इसलिए ब्रिटेन की सरकार ने मध्यस्थता का प्रस्ताव किया । हिटलर ने चेम्बरलेन से मिलना स्वीकार किया । दोनों के मध्य म्यूनिख के निकट बर्खतेसगाडेन में 14 सितम्बर को वार्ता हुई । इस वार्ता के समय हिटलर ने यह स्पष्ट कर दिया था कि अब वह आत्मनिर्णय के सिद्धान्त के आधार पर सूडेटनलैण्ड को हस्तान्तरित किये जाने के उपायों के अतिरिक्त अन्य किसी प्रस्ताव को स्वीकार करने को तैयार नहीं है । चैम्बरलेन ने उस सम्बन्ध में फ्रांस से बातचीत की और दोनों देशों ने मिलकर एक प्रस्ताव चेक सरकार को भेजा, जिसमें कहा गया था, “यूरोप की शान्ति को बनाये रखने के लिए 50 प्रतिशत से अधिक जर्मन आबादी वाले चेक प्रदेश तुरन्त जर्मनी को दे देने चाहियें ।” किन्तु 20 सितम्बर को चेक सरकार ने आंग्ल-फ्रांसीसी प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया । अन्ततः फ्रांस और इंग्लैण्ड के पुनः दबाव के कारण चेक सरकार को यह प्रस्ताव स्वीकार करना पड़ा । फ्रांस तथा ब्रिटेन की नीति की आलोचना करते हुए, 21 सितम्बर को चर्चिल ने कहा था, “इंग्लैण्ड और फ्रांस के दबाव के कारण चेकोस्लोवाकिया के विभाजन का तात्पर्य है -नात्सी बल प्रयोग की धमकी के समक्ष पश्चिमी जनतन्त्रों का पूर्ण समर्पण । इस प्रकार के समर्पण में इंग्लैण्ड और फ्रांस दोनों को शान्ति या सुरक्षा प्राप्त नहीं हो सकेगी।”

चेम्बरलेन एवं हिटलर के मध्य दूसरी वार्ता

चेक सरकार की स्वीकृति प्राप्त होने के पश्चात् चेम्बरलेन एवं हिटलर के मध्य दूसरी वार्ता 22 सितम्बर को राइनलैण्ड में स्थित गोडेसवर्ग में हुई। किन्तु वहाँ पर उसे सर्वथा अप्रत्याशित स्थिति का सामना करना पड़ा । हिटलर ने चेम्बरलेन से कहा कि जर्मनी के साथ ही पोलैण्ड और हंगरी को भी ‘आत्म निर्णय के आधार पर उनके द्वारा माँगे गये क्षेत्र मिलने चाहिये । इसके अतिरिक्त 23 सितम्बर, को उसने चेम्बरलेन को एक ज्ञापन दिया, जिसे अल्टीमेटम का अन्तिम प्रस्ताव कहना अधिक उपयुक्त होगा, जिसमें निम्नलिखित माँगें थीं –

(1) पहली अक्टूबर तक संलग्न नक्शे में दिखाया गया सम्पूर्ण सूडेटन प्रदेश जर्मनी को दे दिया जाय और इस क्षेत्र से चेक सेना तथा पुलिस को हटा लिया जाय ।

(6) हस्तान्तरित होने वाले प्रदेश की सब किलेबन्दियाँ, रेल, कारखाने आदि अक्षत रखे जाएँ। इस प्रदेश से कोई भी खाद्य सामग्री, पशु या कच्चा माल न हटाया जाय। (iii) समस्त जर्मन बन्दियों को मुक्त किया जाये।

(iv) अन्तिम सीमा निर्धारण एक अर्न्तराष्ट्रीय आयोग की देखरेख में एक जनमत संग्रह के द्वारा हो ।

इन प्रस्तावों से शान्तिवादी चेम्बरलेन को गहरा आघात लगा 123 सितम्बर को रात्रि को जब वह पुनः हिटलर से मिला, तो उसने शान्ति बनाये रखने के अपने प्रयत्नों की अवेहलना करने के लिए जर्मन अधिनायक की कड़े शब्दों में भर्त्सना की। यह वार्ता असफल रही।

म्यूनिख समझौता

29 सितम्बर को म्यूनिख में चार बड़े राज्यों का सम्मेलन आरम्म हुआ । इसमें जर्मनी की ओर से हिटलर एवं रिवेनट्राप, ब्रिटेन की ओर से चेम्बरलेन और हेरिस विल्सन, फ्रांस की ओर से दलादियर और लेगर तथा इटली की और से मुसोलिनी तथा सियानों ने भाग लिया । इस सम्मेलन में रूस तथा चेक प्रतिनिधियों को आमन्त्रित नही किया गया | चारों राज्यों के बीच एक समझौता हुआ जिसे ‘म्यूनिख समझौता’ कहा जाता है । इसमें निम्न धाराएँ थी

चेक सरकार सुडेटन प्रदेश को खाली कर देगी और यह कदम 10 अक्टूबर तक पूरा हो जायेगा।

(ii) सुडेटन प्रदेश को खाली करने की शर्तों का निर्धारण एक अन्तर्राष्ट्रीय आयोग करेगा, जिसमें जर्मनी, ब्रिटेन, इटली, फ्रांस, और चेकोस्लोवाकिया का एक एक प्रतिनिधि होगा।

(ii) जनमत संग्रह किन प्रदेशों में किया जाय, इसका निर्णय 5 सदस्यों का उपर्युक्त आयोग करेगा | जनमत संग्रह की तिथि भी आयोग निर्धारित करेगा परन्तु वह नवम्बर के अन्त तक ही होनी चाहिए।

(v) जनता को छ: माह तक, दिये गये प्रदेशों को छोड़ने या उनमें बसने की स्वतन्त्रता होगी।

(ल) चेक सरकार चार सप्ताह के अन्दर जर्मन राजनीतिक बन्दियों को रिहा कर देगी।

(vi) ब्रिटेन तथा कांस ने चेकोस्लोवाकिया के नये सीमान्तों की सुरक्षा की गारन्टी दी।

म्यूनिख समझौते के फलस्वरूप चेकोस्लोवाकिया को बड़ा गम्भीर आभात लगा। उसे ग्यारह हजार वर्ग मील का प्रदेश, सुदृढ़ किलेबन्दी, स्कोड़ा का विशाल शस्त्रास्त्र कारखाना, महत्त्वपूर्ण रेलमार्ग एवं अन्य औद्योगिक संस्थान जर्मनी को सौंपने पड़े।

जर्मन सैनिकों द्वारा सूडेटन प्रदेश पर अधिकार

इस समझौते का लाभ उठाते हुए 1 अक्टूबर, 1938 को प्रातः जर्मन सैनिकों ने सूडेटन प्रदेश पर अधिकार कर लिया और 16 मार्च, 1939 को हंगरी ने चेकोस्लोवाकिया के मेक्यार जिलों को हस्तगत किया। इस समझौते ने पोलैण्ड पर जर्मन आक्रमण को अनिवार्य बना दिया।

इस प्रकार चेकोस्लोवाकिया का अंग-भंग कर दिया गया। यह विभिन्न राष्ट्रों की पराजय और हिटलर की कूटनीतिक विजय थी शूमा के शब्दों में, “इस समझौते के कारण यूरोपीय राष्ट्रों में दरार पड़ गई । सुडेटनलैण्ड पर जर्मनी का अधिकार हो गया । अन्तर्राष्ट्रीय आयोग ने चेकोस्लोवाकिया की नयी सीमा का निर्धारण भी किया। इस समझौते का सभी ने स्वागत किया परन्तु चेकोस्लोवाकिया के लिए यह अपमानजनक था । यह समझौता तुष्टीकरण की नीति का सर्वोच्च विकास और पश्चिमी लोकतन्त्रों का मरणाज्ञा पत्र था। यह सामूहिक सुरक्षा पद्धति के विनाश का प्रतीक था। इस समझौते के सम्बन्ध में डेविड थामसन ने लिखा है, “मित्र राष्ट्रों ने इस मामले में चेकोस्लोवाकिया को सामूहिक सुरक्षा प्रदान करने की बजाय, उसके प्रदेश पर सामूहिक ब्लेकमेल किया, उसे अपना क्षेत्र जर्मनी को सौपने को बाध्य किया । 68 म्यूनिख समझौते के परिणामस्वरूप जर्मनी में हिटलर की प्रतिष्ठा बहुत बढ़ गई । प्रो. शूमां ने भी लिखा है कि यह आतंक पर आधारित उसके नीति कौशल की सबसे बड़ी विजय थी। चर्चिल ने इस समझौते के बारे में एक वक्तव्य में स्पष्ट किया था, “टेकोस्लोवाकिया की शक्ति का अन्त हो जाने का अर्थ यह होगा कि जर्मनी अपनी सेना के 25 डिवीजनों का पश्चिमी मोर्चे पर (फ्रांस के विरूब) उपयोग कर सकेगा और उसके अतिरिक्त, विजयी नात्सियों के लिए काले सागर तक पहुंचने का मार्ग भी खुल जायेगा।

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